सतत विकास क्या है : Satat Vikas Kya Hai Samjhaiye in Hindi

सतत विकास क्या है : Satat Vikas Kya Hai Samjhaiye in Hindi

सतत विकास क्या है : Satat Vikas Kya Hai Samjhaiye in Hindi

सतत विकास क्या है : Satat Vikas Kya Hai Samjhaiye in Hindi – सतत विकास ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है, कि वर्तमान पीढी की जरूरतों को पूरा करनें के साथ- साथ भावी सन्तति की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति में किसी तरह की कठिनाई न हो। आज सतत विकास अति आधुनिक और बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस मुद्दे से सम्बन्धित आज पुरे विश्व में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये गये हैं।

सतत विकास क्या है : Satat Vikas Kya Hai Samjhaiye in Hindi
सतत विकास क्या है : Satat Vikas Kya Hai Samjhaiye in Hindi

अगर आप यह जानने के इच्छुक हैं, कि अमुक परियोजना सतत विकास के सिद्धांतो पर आधारित है या नहीं तो हमें इन मुख्य तथ्यों पर गम्भीरता से ध्यान देने की जरुरत है।

  • क्या इससे जैव विविधता को कोई भी खतरा तो नहीं है।
  • इससे मिटटी का कटाव तो नहीं होगा। 
  • क्या यह बढ़ती जनसंख्या को कम करने में सहायक है। 
  • क्या इससे वन क्षेत्रों को बढानें में प्रोत्साहन मिलेगा। 
  • क्या यह हानिकारक गैसों के निकास को कम कर पायेगी। 
  • क्या इससे अपशिष्ट उत्पादन की कमी हो पाएगी।
  • क्या इससे सभी को लाभ पहुंचेगा अर्थात सभी के लिए लाभदायक है।

यह सभी तथ्य और घटक सतत विकास के परिचालक हैं तथा इनको अनदेखा नहीं किया जा सकता है। अब हमने जो देखा है, कि विकास मानव जाति पर केन्द्रित रहा है और वह भी कुछ गिने चुने देशो में अर्थात विकसित देशो में। पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, कि किस मूल्य पर वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के आधार पर अभूतपूर्व प्रगति की है। इन 5 प्रगति से हवा, पानी और भोजन तीनों प्रदूषित हुए हैं और हमारे सभी प्राकृतिक संसाधनों का निर्दयता से शोषण होता रहा है। अगर इसी प्रकार से ये प्रक्रिया जारी रही तो फिर एक दिन ऐसा आयेगा की जब हम मीडोस की विश्व प्रसिद्ध रिपोर्ट ‘विकास की सीमाओं में वर्णित, साक्षात रूप से प्रलय की गोद में जा रहे होंगे। यह नियन्त्रण रहित विकास का ही परिणाम रहेगा, कि इस पृथ्वी और इससे सम्बन्धित सभी तत्वों का सन्तुलन बुरी तरह टूट जाएगा या तो फिर बिगड जाएगा।

मनुष्य का ध्यान इस नियन्त्रण रहित विकास की तरफ 70 के दशक में चल रहा था पर यह अन्तराष्ट्रीय स्तर पर परिचर्या रियो-डि-जनेरियो ब्राजील में 1992 की संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास संगोष्ठी में हुई थी जिसको पृथ्वी सम्मेलन के नाम से जाना जाता है। रियो घोषणा का प्रमुख लक्ष्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी राष्ट्रों की बीच सहयोग था। इसकी एक प्रमुख घोषणा ‘एजैंडा 21 में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य सन्दर्भ’ में 21वी सदी में सतत विकास के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम की रूप रेखा प्रस्तुत की गई है। संयुक्त राष्ट्र के द्वारा यह निर्णय लिया है, कि सम्मेलन में सभी देशों में पर्यावरण से सम्बन्धी ह्रास को रोकना और इस प्रक्रिया को बदलने के लिए पर्यावरण के सम्बन्ध में ठोस तथा सतत विकास के लिए कार्य से सम्बन्धित कार्य, नीतियों और उपायों पर विचार विमर्श किया जाएगा। 

सितम्बर 2003 जोहान्सबर्ग दक्षिण अफ्रीका में आयोजित ‘अर्थ सम्मिट’ की विषय वस्तु सतत विकास थी। तथा ब्रंट कमीशन 1987 के अनुसार सतत विकास से यह तात्पर्य है की भावी पीढी द्वारा उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने की और अपनी क्षमता को प्रभावित किये बिना वर्तमान समय की आवश्यकताओं को पूरा करना है। इसलिए सतत विकास से अभिप्राय उस विचारधारा और उस सोच से है जहां मानव की क्रियाओं के परिणामस्वरूप प्रकृति की पुन: उत्पादक शक्तियां और क्षमताएं सन्तुलन में बनी रहती हैं।

परिभाषा

ब्रन्टलैंड प्रतिवेदन, के अनुसार “सतत विकास वह विकास है जो वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति आगे की पीढ़ियों की आवश्यकताओं की बलि दिये बिना पूरी करता हो।” विकास के विभिन्न विभिन्न अर्थ व परिभाषाओं का सार यही निकलता है कि विकास वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है जो लगातार चलती रहती है। 

यह प्रक्रिया तभी सार्थक होती है जब इसमें मानव विकास, आर्थिक वृद्धि और पर्यावरण सुरक्षा के बीच एक उचित संतुलन बना हो। सतत विकास का अर्थ एक ऐसे विकास से होता है जहा वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ भविष्य की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाए। और विकास ऐसा हो जो केवल ढांचा खड़ा करने में ही विश्वास न रखता हो बल्कि अन्य पहलुओं जैसे मानव संसाधन के विकास, पर्यावरण सन्तुलन, संसाधनों का उचित रख-रखाव व संरक्षण, लाभों के समान वितरण हेतु उचित व्यवस्था आदि को भी ध्यान में रखा जाता हो। 

जो किसी भी विभाग/संस्था और व्यक्ति पर निर्भर न रहकर स्वावलम्बी हो और स्थानीय निवासियों के द्वारा संचालित हो। सतत विकास में जनसहभागिता की बड़ी अहम भूमिका होती है।

सतत विकास के सिद्धांत

सतत विकास को ठीक से समझने के लिए उसके सिद्धान्तों को जानना जरुरी है। सतत विकास के मुख्य सिद्धांत है।

1. स्थानीय समुदाय का सशक्तिकरण

सतत विकास प्रक्रिया का प्रथम सिद्धान्त है जन समुदाय का सशक्तिकरण करना। विकास के साथ पैदा होने वाले सबसे बड़े अवरोधों में स्थानीय समुदाय की संस्कृति, पारम्परिक अधिकारों, संसाधनों तक पहुंच और आत्म-सम्मान आदि की अवहेलना इसमें मुख्य है। इसके कारण स्थानीय समुदाय का विकास कार्यक्रमों के प्रति जुड़ाव के स्थान पर अलगाव और रोष पैदा होता है। अत: विकास को चिरन्तर या सत्त बनाने के लिए स्थानीय निवासियों के अधिकारों को पहचानना और उनके सभी मुद्दों को समर्थन प्रदान करना जरुरी है। 

साथ ही साथ सतत विकास की प्रक्रिया समुदायों को जोड़ती है व उनके सशक्तिकरण को भी बढ़ावा देती है।

2. स्थानीय ज्ञान एवं अनुभवों को महत्व 

स्थानीय समुदाय पारम्परिक ज्ञान, अनुभव तथा कौशल का धनी है। विकास के नाम पर नये विचार एवं ज्ञान थोपने के स्थान पर सतत विकास स्थानीय निवासियों के ज्ञान और उनके अनुभवों को महत्व देता है तथा उपलब्ध ज्ञान और उपलब्ध अनुभवों को आधार मानकर विकास कायर्क्रम तैयार करे जाते है।

3. स्थानीय समुदाय की आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं की पहचान

सतत विकास का अगला सिद्धान्त यह है की विकास प्रक्रिया का समुदाय की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं पर आधारित होना। जमीनी वास्तविकताओं को नजर अन्दाज करके ऊपर से थोपा गया विकास कभी भी समाज में सकारात्मक बदलाव नहीं ला सकता है। अत: आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं की पहचान स्थानीय निवासियों के साथ मिल-बैठ कर तथा उनके दृष्टिकोण एवं नजरिये को समझ करके करने से ही सतत विकास की तरफ बढ़ा जा सकता है।

4. स्थानीय निवासियों की सहभागिता 

कार्यक्रम नियोजन से लेकर क्रियान्वयन और प्रबन्धन में ग्रामवासियों की सहभागिता को सतत विकास की प्रक्रिया में आवश्यक माना है। सहभागिता का अर्थ भी स्पष्ट होना चाहिए और स्थानीय समुदाय द्वारा विभिन्न स्तरों पर लिये गये निर्णयों को स्वीकार करना ही उनकी सच्ची सहभागिता को प्राप्त करना है।

5. लैंगिक समानता 

पिछले अनुभवों से स्पष्ट है कि विकास की जिन गतिविधियों को महिला और पुरुषों दोनों की जरूरतों को ध्यान में रख कर तैयार नहीं करा जाता है और जिनमें महिलाओं की बराबर भागीदारी नहीं होती है, वह न केवल अनुचित होती है बल्कि उनके सफल और चिरन्तर होने में संदेह होता है। चिरन्तर बनाने के लिए विकास को महिलाओं और पुरूषों की भूमिकाओं, प्राथमिकताओं तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार करना पहली शर्त है।

6. कमजोर वर्गों को पूर्ण अधिकार 

सतत विकास का यह सिद्धान्त है समाज के सभी वर्गो को विकास के नियोजन में शामिल करना तथा विकास का लाभ पहुँचाना है। सदियों से विकास प्रक्रिया से अछूते और उपेक्षित रहे समाज के कमजोर वर्गो जैसे भूमिहीन, अनुसूचित जाति तथा जनजाति व महिलाओं को आधुनिक विकास प्रक्रिया में शामिल करने पर सतत विकास उनको बल प्रदान करता है। अत: चिरन्तरता के लिए समाज के सभी कमजोर और उपेक्षित वर्ग के अधिकारों का समर्थन करना आवश्यक है और उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जाना भी जरुरी है।

7. जैविक विविधता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण 

आर्थिक वृद्धि, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जुड़ाव सतत विकास के मजबूत स्तम्भ हैं। विकास की जिस प्रक्रिया में इन तीनों को साथ लेकर नियोजन करा जाता है वह सतत विकास कहलाता है। पर्यावरण को खतरे में डालकर व सामाजिक मूल्यों की परवाह किये बगैर अगर आर्थिक विकास की प्रक्रिया को बल देते है तो वह सतत विकास नहीं है। पिछले कुछ वर्षो में हुए विकास कार्यों के कारण जैविक विविधता में गिरावट आई है और इससे प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास हुआ है। सामूहिक हित की जगह व्यक्तिगत हित ने ले लिया है। 

पारिस्थितिकीय तन्त्र के विभिन्न घटकों का सन्तुलन खराब हो जाने के कारण बहुत सी पर्यावरणीय समस्याएं पैदा होने लग गई हैं। अत: विकास को चिरन्तर बनाने के लिए आर्थिक विकास के साथ-साथ जैविक विविधता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जरुरी है।

8. स्थानीय तकनीकों, निवेश तथा बाजार को बढ़ावा

बाहरी सहयोग पर आधारित विकास कार्यों की लम्बे समय तक चलने की बिलकुल भी कोई गारन्टी नहीं होती है। साथ ही साथ बाहरी तकनीक की समाज में स्वीकार्यता पर भी शंकाएं की जाती है। अत: विकास की चिरन्तरता हेतु स्थानीय तकनीकों को सुधार करके उनके उपयोग को बढ़ावा देना, स्थानीय स्तर पर संसाधनों को जुटाना और स्थानीय बाजार व्यवस्था को मजबूत बनाना जरुरी है।

सतत विकास से आप क्या समझते है ?

सतत विकास वो विकास है जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझौता करे बिना ही वर्तमान की जरूरतों को पूरा करता है।

सतत विकास का क्या महत्व है ?

सतत आर्थिक विकास में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, गरीबी, उन्मूलन, सामाजिक न्याय पर भी जोर दिया जाता है। जिससे जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि होती हैं। सतत विकास में ऐसी उत्पादन तकनीक को अपनाया जाता है जो पर्यावरण के अनुकूल हो। फलतः पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न नहीं होती है।

सतत विकास की क्या विशेषताएं है ?

सतत विकास एक प्रक्रिया है, जिसमें पर्यावरणीय, सामाजिक व आर्थिक संसाधनों के दोहन को इस तरह से लागू करने पर जोर दिया जाता है कि संसाधन पूरी तरह से नष्ट न हो। भविष्य में संसाधनों के पुन: उपयोग को महत्व दिया जाता है। सतत विकास का प्रयोजन वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए औसत जीवन गुणवत्ता को बनाए रखना है।

यह भी पढ़े:

Leave a Comment

Your email address will not be published.