Samajik Niyantran Kya Hai in Hindi : सामाजिक नियंत्रण क्या है ?

Samajik Niyantran Kya Hai in Hindi : सामाजिक नियंत्रण क्या है ?

Samajik Niyantran Kya Hai in Hindi : सामाजिक नियंत्रण क्या है ?

Samajik Niyantran Kya Hai in Hindi : सामाजिक नियंत्रण क्या है ? – इस आर्टिकल मे हम सामाजिक नियन्त्रण क्या होता हैं? सामाजिक नियन्त्रण किसे कहते हैं? सामाजिक की परिभाषा, सामाजिक नियन्त्रण के स्वरूप या प्रकार एवं सामाजिक नियन्त्रण की जरुरत या महत्व बताया गया है।

Samajik Niyantran Kya Hai in Hindi : सामाजिक नियंत्रण क्या है ? – मानव एक सामाजिक प्राणी है। जब मनुष्य जन्म लेता है तब उसमें और अन्य प्राणियों मे सिर्फ शारीरिक भिन्नता होती है। समाज के एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में स्थापित होने के लिए उसे अपने व्यवहारों को समाज की मान्यताओं के अनुरूप ढालने पड़ते है। समाज जिन तरीकों के जरिये व्यक्तियों के व्यवहारों का नियमन करता, उन्ही को सामाजिक नियंत्रण के नाम से जाना जाता है। मनुष्य प्रकृति से स्वार्थी, व्यक्तिवादी, हिंसक, लड़ाकू होता है। अगर उसकी इस प्रवृत्ति को नियंत्रण में नहीं रखा जाये तो समाज के अंदर अराजकता उत्पन्न हो जायेगी। अतः इन सब से बचने के लिये समाज सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था करता है।

सामाजिक नियन्त्रण का अर्थ (samajik niyantran kya hai)

सामाजिक नियंत्रण वह प्रक्रिया है जिसके तहत समाज व्यक्ति एवं समूह के संबंधों, व्यवहारों तथा आचरणों को नियंत्रित, निर्देशित और व्यवस्थित करता है एवं व्यक्तियों को समाज के स्थापित मूल्यों, नियमों एवं कार्यप्रणालियों के अनुरूप अपने को ढालने के लिए प्रेरित या बाध्य करता है। वस्तुतः सामाजिक नियन्त्रण सामाजिक अध्ययन का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। समाज की विभिन्न इकाइयों जैसे की व्यक्ति, समूह, संस्था, एवं समित, आदि को अगर अपनी स्वेच्छा के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता दे दी जाये तो समाज का संगठन समाप्त हो जायेगा और समाज मे अराजकता फैल जाएंगी। इस स्थिति को टालने के लिए हर समाज अपने सदस्यों, समितियों संस्थाओं के व्यवहारों पर प्रतिबंध लगाता है। समाज के जरिये लगाया गया ये नियंत्रण सामाजिक नियन्त्रण कहलाता हैं।

सामाजिक नियंत्रण की परिभाषा l Samajik Niyantran Ki Paribhasha

बोगार्ड के अनुसार ” सामाजिक नियंत्रण वह पद्धति है, जिसमे एक समूह अपने सदस्य के व्यवहारों को नियंत्रित करता हैं।

टी. बी. वोटोमोर  ” सामाजिक नियंत्रण शब्द का अभिप्राय मूल्यों और आदर्शों के उस समूह से है जिसके द्वारा व्यक्तियों और समूहों के बीच संघर्ष को दूर अथवा कम किया जाता है जिससे किसी अधिक समावेशी समूह की सुदृढ़ता बनायी रखी जा सके। 

मैकाइवर एवं पेज ” सामाजिक नियंत्रण से आशय उस तरीके से है जिससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था अपने को संगठित बनाए रखती है– एक परिवर्तनशील सन्तुलन की भाँति अपने को क्रियाशील रखती हैं।

राॅस के अनुसार,” सामाजिक नियंत्रण उन पद्धतियों की व्यवस्था है जिनके द्वारा समाज अपने सदस्यों को मान्य-व्यवहार प्रतिमानों के अनुरूप बनाता है।” 

आर. जी. स्मिथ के अनुसार,” सामाजिक नियंत्रण उन उद्देश्यों की प्राप्ति है जो उन उद्देश्यों के साधनों के प्रति चेतन सामूहिक अनुकूलन द्वारा होती है। 

लैंडिस के अनुसार,” सामाजिक नियंत्रण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सामाजिक व्यवस्था स्थापित तथा बनाये रखी जाती हैं।” 

ऑगबर्न व निमकाॅक के अनुसार,” व्यवस्था तथा स्थापित नियमों को बनाये रखने के लिए समाज जिस दबाव के प्रतिमान का प्रयोग करता है वह उसकी सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था कहलाती है।”

सामाजिक नियंत्रण के साधन

समाज को संगठित रखने में सामाजिक नियंत्रण की एक मुख्य भूमिका होती है। समाज के कई सारे ऐसे नियम या अभिकरण है जो की समाज में सामाजिक नियंत्रण को बनाये रखते है। ये ऐसे साधन है जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करके समूह के मूल्यों, नियमों और रिति रिवाजों का पालन करने के लिए प्रेरित या बाध्य करते है। समाज शास्त्रियों ने सामाजिक नियंत्रण के अलग-अलग साधन बताये है।

  • ई0 ए0 रॉस ने जनमत, कानून, प्रथा, धर्म, नैतिकता, लोकाचार एवं लोकरितीयों को सामाजिक नियंत्रण का मुख्य साधन माना है।
  • ई0 सी0 हेज ने सामाजिक नियंत्रण के रूप में शिक्षा, परिवार, सुझाव, अनुकरण, पुरूष्कार और दण्ड प्रणाली को नियंत्रण का सबसे प्रभावी साधन तथा महत्वपूर्ण अभिकरण माना है।
  • लूम्ले ने सामाजिक नियंत्रण के साधन को दो वर्ग बल पर आधारित और प्रतीकों पर आधारित में विभक्त करा है। जिसमें शारीरिक बल और पुरूष्कार, प्रशंसा, शिक्षा, उपहास, आलोचना, धमकी, आदेश एवं दण्ड शामिल है।
  • लूथर एल0 बर्नाड ने सामाजिक नियंत्रण के साधन को अचेतन और चेतन के रूप में बाटा है। अचेतन साधनों मे प्रथा, रिति रिवाज और परम्परायें है। चेतन साधन में दण्ड, प्रतिकार एवं धमकी आदि है।

सामाजिक नियंत्रण के प्रकार

विभिन्न समाजशास्त्रियों ने सामाजिक नियंत्रण के स्वरूप को अनेकों प्रकार से वर्गीकृत करा है।

कार्ल मैनहीम ने सामाजिक नियंत्रण के 2 प्रकार बताये है।

  • प्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण
  • अप्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण

1. प्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण

प्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण प्राय: प्राथमिक समूहों में होता है। जैसे परिवार, पड़ोस एवं खेल समूह। यह नियंत्रण व्यक्ति पर उन व्यक्तियों के जरिये किये गये व्यवहार एवं प्रक्रियाओं का प्रभाव है जो उसके सबसे करीबी हो। क्योंकि व्यक्ति पर उसके साथ रहने वाले व्यक्ति के व्यवहार का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। यह नियंत्रण प्रशंसा, निन्दा, आलोचना, सुझाव, पुरस्कार, आग्रह और सामाजिक बहिष्कार आदि के जरिये लगाया जाता है एवं प्रत्यक्ष रूप से लगाया गया सामाजिक नियंत्रण का प्रभाव स्थायी होता है और व्यक्ति इसको स्वीकार भी करता है।

2. अप्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण

अप्रत्यक्ष या परोक्ष सामाजिक नियंत्रण व्यक्ति पर द्वितीयक समूहों के जरिये लगाये गये नियंत्रण से है। विभिन्न समूहों, संस्थाओं, जनमत, कानूनों एवं प्रथाओं के जरिये व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित कर एक विशेष प्रकार का व्यवहार करने को बाध्य करा जाता है। व्यक्ति इस नियंत्रित व्यवहार को धीरे-धीरे अपनी आदतों में सम्मिलित कर लेता है यही अप्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण है। समाज और समूह को व्यवस्थित और संगठित रखने के लिए अप्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण का विशेष महत्व होता है एवं यह समूह के कल्याण में अपनी विशेष भूमिका का निर्वहन करते है।

चाल्र्स कूले ने सामाजिक धटनाओं के आधार पर सामाजिक नियंत्रण के प्रकारों को स्पष्ट किया है। कूले के अनुसार सामाजिक धटनायें 2 प्रकार से समाज को नियंत्रित करती है।

3. चेतन नियंत्रण

मानव अपने जीवन में अपने समूह के लिए कई कार्य और व्यवहार जागरूक अवस्था में सोच समझ कर करता है। ये चेतन अवस्था कहलाती है। एवं जागरूक अवस्था में करा गया कोई भी काम चेतन नियंत्रण कहलाता है।

4. अचेतन नियंत्रण

प्रत्येक समाज या समूह की अपनी संस्कृति, प्रथायें, रीति रिवाज, लोकाचार, परम्परायें एवं संस्कारों से निरन्तर प्रभावित होकर उनके अनुरूप ही समाज एवं समूह के प्रति व्यवहार करता है, इन प्रथाओं रीति रिवाजों एवं धार्मिक संस्कारों के प्रति व्यक्ति अचेतन रूप से जुड़ा रहता है और जीवन पर्यन्त वह उसकी अवहेलना नहीं कर पाता जो समाज व समूह को नियंत्रित करने में अपनी प्रमुख भूमिका निभाते है। ये अचेतन नियंत्रण कहलाता है।

किम्बाल यंग ने सामाजिक नियंत्रण को सकारात्मक नियंत्रण और नकारात्मक नियंत्रण 2 भागों में विभाजित किया है।

5. सकारात्मक नियंत्रण

सकारात्मक नियंत्रण में पुरस्कारों के तहत व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करा जाता है। प्रोत्साहन और पुरस्कार व्यक्ति की कार्यक्षमता को तो बढाता ही है साथ ही अच्छे कामो के लिए प्रेरित भी करता है। प्रथाओं एवं परम्पराओं का पालन करने की कोशिश करता है जो समाज उसे एक सम्मानजनक स्थिति देता है। उदाहरण के लिए स्कूल कालेजों में विद्यार्थियों को एवं समाज में उत्कृष्ट काम करने के व्यक्ति को पुरस्कार द्वारा सम्मानित करना।

5. नकारात्मक नियंत्रण

जहां एक ओर समाज में प्रोत्साहन और पुरस्कारों के जरिये व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करा जाता है वही दूसरी ओर दण्ड के तहत भी व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करा जाता है। समाज के जरिये स्वीकृत नियमों, आदर्शों, मूल्यों एवं प्रथाओं का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को अपराध के स्वरूप के आधार पर सामान्य से मृत्यु दण्ड तक दिया जाता है। यही कारण है कि व्यक्ति आदर्शों के विपरीत आचरण नहीं करते और करने से डरतें है। इस तरह के नियंत्रण नकारात्मक नियंत्रण कहलाते है। जैसे कि जाति के नियमों के विरूद्ध आचरण करने वाले व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है।

गुरविच और मूरे ने सामाजिक नियंत्रण को संगठित, असंगठित, सहज नियंत्रण 3 भागों में विभाजित करा है।

7. संगठित नियंत्रण

इस तरह के निंयंत्रण में लिखित नियमों के जरिये व्यक्तियों के व्यवहारों को नियंत्रित कर दिया जाता है। जैसे की राज्य के कानून इसके उदाहरण है। 

8. असंगठित नियंत्रण

विभिन्न तरह के संस्कारों, प्रथाओं, लोकरीतियां और जनरीतियों के जरिये स्थापित नियंत्रण असंगठित नियंत्रण कहलाता है।

9. सहज नियंत्रण

प्रत्येक व्यक्ति की अपनी जरूरते, नियम, मूल्य, विचार औरआदर्श होते है अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए वक़्त पर निर्भर रहना पड़ता है एवं इन जरूरतों की पूर्ति के लिए व्यक्ति स्वीकृत नियमों के अन्दर रहकर ही करता है। इस तरह के नियंत्रण को सहज सामाजिक नियंत्रण कहते है। 

जैसे की धार्मिक रीति रिवाजों का पालन सहज सामाजिक नियंत्रण का उदाहरण है।

10. औपचारिक नियंत्रण

औपचारिक नियंत्रण के अन्तर्गत समाज में स्थापित एक ऐसी व्यवस्था जिसकी स्थापना राज्य एवं समाज मे व्याप्त औपचारिक संगठनों के जरिये बनाये गये स्वीकृत नियमों के आधार पर समूह के व्यक्तियों के व्यवहार पर नियंत्रण रखना होता है। इस प्रकार के नियमों का पालन न करने पर एवं उसका उल्लधंन करने पर दण्ड व्यवस्था का भी प्राविधान रखा जाता है। 

जैसे की कानून, न्यायपालिका, पुलिस, प्रचार प्रसार संगठन आदि।

11. अनौपचारिक नियंत्रण

अनौपचारिक नियंत्रण में किसी तरह के लिखित कानूनों की जरुरत नहीं होती बल्कि समाज में व्याप्त स्वीकृत नियम, आर्दश,मूल्य, जनरीतियां, प्रथायें, लोकाचार और नैतिक नियमों के आधार पर नियंत्रण रखा जाता है।

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