पर्यावरण क्या है, के प्रकार और परिभाषा। Paryavaran Kya Hai Samjhaiye

पर्यावरण क्या है, के प्रकार और परिभाषा। Paryavaran Kya Hai Samjhaiye

पर्यावरण क्या है, के प्रकार और परिभाषा। Paryavaran Kya Hai Samjhaiye

पर्यावरण क्या है, के प्रकार और परिभाषा। Paryavaran Kya Hai Samjhaiye – पर्यावरण शब्द दो शब्दों के समूह से मिलकर बना है जिसमे पहला शब्द है परि और दूसरा शब्द है आवरण इसमें परि का अर्थ है चारों तरफ से’ और आवरण का अर्थ है ‘घिरे हुए ’। अंग्रेजी में पर्यावरण को Environment कहा जाता हैं इस शब्द की उत्पकि ‘Envirnerl’ से हुई है और इसका अर्थ है Neighbonrhood अर्थात आस-पड़ोस। पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है हमारे आस-पास जो कुछ भी उपस्थित है इस तरह हम समझ सकते हैं कि पर्यावरण का अर्थ हमारे आस-पास जो भी मौजूद है जिसमे हम घिरे हुए है पर्यावरण कहलाता है, जैसे जल, थल, वायु तथा समस्त प्राकृतिक दशाएं, पर्वत, मैदान व अन्य जीवजन्तु, घर, मोहल्ला, गाँव, शहर, विद्यालय महाविद्यालय, पुस्तकालय आदि जो हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। पर्यावरण में सजीव व निर्जीव दोनों प्रकार के तत्व पाए जाते है।

पर्यावरण क्या है, के प्रकार और परिभाषा। Paryavaran Kya Hai Samjhaiye
पर्यावरण क्या है, के प्रकार और परिभाषा। Paryavaran Kya Hai Samjhaiye – Pic CreditAsian Institue of medical science

विद्वानों द्वारा दी गई पर्यावरण की परिभाषा –

पर्यावरण की परिभाषा डॉ डेविज के अनुसार – “ मनुष्य के सम्बन्ध में पर्यावरण से अभिप्राय भूतल पर मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है। जिसके वह निरन्तर प्रभावित होते रहते हैं। डडले स्टेम्प के अनुसार- “ पर्यावरण प्रभावों का ऐसा योग है जो किसी जीव के विकास एंव प्रकृति को परिस्थितियों के सम्पूर्ण तथ्य आपसी सामंजस्य से वातावरण बनाते हैं।”

पर्यावरण के सम्बन्ध में डगलस व रोमन हॉलेण्ड – ‘‘पर्यावरण उन सभी बाहरी शक्तियों व प्रभावों का वर्णन करता है जो प्राणी जगत के जीवन स्वभाव व्यवहार विकास एवं परिपक्वता को प्रभावित करता है।’’  

जे.एस. रॉस के अनुसार – “ पर्यावरण या वातावरण वह वाह्य शक्ति है जो हमें प्रभावित करती हैं।” 

हर्स, कोकवट्स का पर्यावरण पर कहना – “ पर्यावरण इन सभी बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग है तो प्राणी के जीवन तथा विकास पर प्रभाव डालता है।” 

टामसन के द्वारा पर्यावरण की परिभाषा जो कि एक शिक्षा शास्त्री हैं – “पर्यावरण ही शिक्षक है और शिक्षा का कार्य छात्रों को उसके अनुकूल बनाना है।”

सी सी पार्क के अनुसार पर्यावरण की परिभाषा – “व्यक्ति एक विशेष समय पर जिस सम्पूर्ण परिस्थिति से घिरा हुआ है उसे पर्यावरण या वातावरण कहते हैं।”

इस तरह विज्ञानिको ने अपने अनुसार पर्यावरण को परिभाषित किया है।

पर्यावरण के तत्व

पर्यावरण के चार तत्व है।

1. स्थल मण्डल

पृथ्वी के सबसे ऊपर की परत ठोस पाई जाती है यह अनेक प्रकार की चट्टानों, मिट्टी और ठोस पदार्थों से मिलकर बनी होती है। इसे ही स्थल मंडल कहा जाता है। स्थलमंडल में भूमि भाग व समुद्री तल दोनों ही आते हैं। स्थल मंडल पूरी पृथ्वी का केवल 3/10 भाग है शेष 7/10 भाग समुद्र ने ले लिया है।

2. जल मण्डल

पृथ्वी के स्थल मण्डल के नीचे के भागों में स्थित जल से भरे हुए भाग को जल मण्डल कहा जाता हैं जैसे की झील, सागर व महासागर आदि। 97.3% जल महासागरों और सागरों में है। शेष 2.7% जल हिमनदो और बर्फ के पहाड़ों, मीठे जल की झीलों नदियों तथा भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है।

3. वायुमण्डल

भू मण्डल का तीसरा मण्डल वायुमण्डल कहलाता है। स्थल मण्डल व जल मण्डल के चारों ओर गैस जैसे पदार्थों का एक आवरण होता है। इसमें नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बनडाइआक्साइड व अन्य गैसें, मिट्टी के कण, पानी की भाप और अन्य अनेक पदार्थ, मिले हुए होते हैं। इन सभी पदार्थों के मिश्रण से बना आवरण को वायु मण्डल कहलाता है। वायु मण्डल पृथ्वी की रक्षा करने वाला रोधी आवरण होता है। यह सूर्य के गहन प्रकाश व ताप को नरम करता है। इसकी ओजोन (O3) परत सूर्य की और से आने वाली अत्यधिक हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है। इस प्रकार यह जीवों के विनाश होने से रक्षा करती है।

4. जैव मण्डल

जैव मण्डल का विशिष्ट लक्षण यह है कि वह जीवन को आधार प्रदान करती है। यह एक विकासात्मक प्रणाली होती है। इसमें अनेक प्रकार के जैविक व अजैविक घटकों का संतुलन बहुत पहले से क्रियाशील रहा है। जीवन की इस निरन्तरता के मूल में अन्योन्याश्रित सम्बन्धों का एक सुघटित तंत्र कार्य करता है। वायु जल मनुष्य, जीव जन्तु, वनस्पति, लवक मिट्टी एवं जीवाणु ये सभी जीवन चरण प्रणाली में अदृश्य रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं और इस व्यवस्था को पर्यावरण कहते है। तथा सौर ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। 

यह जैवमण्डल को जीवित बनाए रखती है। जैव मण्डल को मिलने वाली कुल ऊर्जा का 99.98% भाग इससे ही प्राप्त होता है।\

पर्यावरण के प्रकार

पर्यावरण के विभिन्न-विभिन्न प्रकार दिए है। पर मुख्य रूप से पर्यावरण के तीन प्रकार होते है ।

1. भौतिक पर्यावरण या प्राकृतिक पर्यावरण – इसके अंतर्गत वायु, जल और खाद्य पदार्थ भूमि, ध्वनि, उष्मा प्रकाश, नदी, पर्वत, खनिज पदार्थ, विकिरण आदि पदार्थ पाए जाते हैं। मनुष्य इनसे निरंतर सम्पर्क में रहता है इसलिए यह मनुष्य के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

2. जैविक पर्यावरण – जैविक पर्यावरण बहुत बड़ा अवयव है जो मनुष्य के इर्द-गिर्द रहता है। यहाँ तक कि एक मनुष्य के लिए दूसरा मनुष्य भी पर्यावरण का एक भाग होता है। जीवजन्तु और वनस्पति इस घटक के प्रमुख सहयोगी होते है। 

3. मनो-सामाजिक पर्यावरण – मनो-सामाजिक मनुष्य के सामाजिक संबंधों से प्रकट होता है। इसके अंतर्गत आने वाले सामाजिक आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में मनुष्य के व्यक्तिगत के विकास का अध्ययन करते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, पत्नि तथा समाज में पड़ौसियों के साथ संबंध बनाकर रहना पड़ता है। तथा उसे समुदाय प्रदेश और राष्ट्र से भी सम्बन्ध बनाकर रहना पड़ता है। 

मनुष्य सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का उत्पाद होता है जिसके द्वारा मनुष्य का आकार बनता है। रहन-सहन, खान-पान, पहनावा-औढ़ावा, बोल-चाल या भाषा शैली व सामाजिक मान्यताएँ मानव व्यक्तिगत का ढ़ाँचा तैयार करती है।

पर्यावरण के हानिकारक तत्व

1. हानिकारक गैसें – जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ोतरी होती जा रही है वैसे-वैसे मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूरा करने के लिए वन काटकर औद्योगिक धंधों का विस्तार करता जा रहा है। कारखानों से जहरीली गैसों का रिसाव होता है जिसके कारण हमारे सम्पूर्ण विश्व का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ फल-फूल रही हैं। नाक, साँस लेने में परेशानी, पीलिया होना, सिरदर्द, दृष्टि दोष, क्षयरोग तथा कैंसर आदि रोग जहरीली गैसों के कारण ही होते है।

2. जल प्रदूषण – जल प्रदूषण का प्रभाव विश्व के समस्त देशों को प्रभावित कर रहा है। समुद्री प्रदूषण को खनिज तेलों को ले जाने वाले जहाजों के दुर्घटनाग्रस्त होने और नदियों के प्रदूषित जल का समुद्र में मिलना आदि समुद्री पप्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। समुद्री जल के प्रदूषण से जीव-जन्तु तथा मनुष्य के जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ता हैं और इसके कारण मनुष्य को संक्रामक रोग हो जाते हैं। 

3. विकरणीय प्रदूषण – विकरणीय प्रदूषण मानवीय स्वास्थ्य एवं उसके विकास के लिए बहुत हानिकारक होता है। इसका प्रभाव मानव शरीर के आंतरिक और बाहरी भागों पर पड़ता है। इसलिए हमें रेडियोधर्मी विकिरण से बचना चाहिए। 

पर्यावरणीय समस्याएं 

वो सभी कार्य, कारण अथवा स्थितियाँ जिनसे कृतिदत्त पर्यावरण क्षतिग्रस्त, नष्ट, विकृत अथवा विलोवित होता हैं। यह सभी पर्यावरणीय समस्यायें कहलाती हैं। इनसे मनुष्य के जीवन को खतरा, आर्थिक हानि, जीवन की गुणवत्ता का हास तथा अनेक संकट पैदा होते हैं तथा सामान्यतः जिनका निदान संभव नहीं होता है। यद्यपि वैज्ञानिक शोध ने इस दिषा में काफी तरक्की हासिल कि है, और विभिन्न पर्यावरणीय संकटों से बचने के लिये विभिन्न उपाय बताये हैं। तथा विभिन्न संकटों से बचना एक अत्यधिक जटिल और कठिन कार्य हैं। इन समस्याओं को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है। 

  1. प्राकृतिक पर्यावरणीय समस्याएं
  2. मानवकृत पर्यावरणीय समस्याएं

1. प्राकृतिक पर्यावरणीय समस्याएं

प्राकृतिक पर्यावरण की समस्याये पर्यावरण की वह समस्या हैं। जिससे मानव जीवन की हानि और सम्पति को नुकसान पहुँचता हैं। इन्हें प्रकृतिदत्त अनहोनी अथवा ईश्वरीय प्रकोप भी कहा जाता हैं इन संकटों में बाढ़, सूखा, भूकम्प चक्रवात, बिजली गिरना, कुहय, बर्फ गिरना, ओलावृष्टि, तूफान, गर्म शर्द हवाएँ आदि इसके अंदर शामिल है। 

 2. मानवकृत पर्यावरणीय समस्याएं

इस श्रेणी के अंदर इन बाधाओं को रखा जाता है जो स्पष्ट किसी न किसी प्रकार से मनुष्य के क्रियाकलापों के द्वारा उत्पन्न होती हैं। और यह पर्यावरण को विकृत करने के लिये उत्तरदायी है। बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्यान्न को पूर्ति करने के लिये विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाषकों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। इससे पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और भूमि की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। इसी प्रकार जल विश्व में असीमित मात्रा में उपलब्ध था परन्तु अधिक उपयोग तथा ठीक ढंग से उपयोग न करने के कारण आज अनेक देशों में जल की पूर्ति एक जटिल समस्या बन गई हैं। 

1. वायु प्रदूषण – वायु की मूल संरचना को ही मानव क्रियाकलापों ने छिन्न-भिन्न कर दिया हैं। वनों की कटाई, जीवाष्म ईंधन का अधिक उपयोग, औद्योगीकरण, क्लोरोफ्लोरों, कार्बन की मात्रा की वायुमंडल में निरंतर हो रहि वृद्धि आदि वायु प्रदूषण से संबंधित निम्न समस्याओं को जन्म दे रही हैं। (१) ग्रीन-हाउस प्रभाव  (२) तेजाबी वर्षा (३) ओजोन पर्त का क्षय (४) स्मोग घटनाएँ  

2. जल प्रदूषण :- आज के समय अनेक शहरों तथा गाँवों में पीने का शुद्ध जल उपलब्ध नहीं हैं। औद्योगिक जल-स्त्राव, घरेलू मज-जल वर्षा के जल के साथ आने वाली गन्दगी भू-जल का अति उपयोग आदि अनेक ऐसे कारण है जिनके कारण पीने के पानी के स्रोत तथा भू-गर्भ जल भण्डार प्रदूषित हुए है। जल का दूषित होने से मानव स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। 

3. भूमि या मिट्टी प्रदूषण :- कृषि में उपस्थित उर्वरकों, कीटनाषकों एवं अन्य रासायनिक तत्वों ने भूमि को प्रदूषित किया है। भूमि प्रदूषण से जल-प्रदूषण हुआ है। तथा भू-जल का सिंचाई में उपयोग से जल-स्तर क्रमषः गिरता जा रहा हैं। वृक्षों की कटाई ने भू-क्षरण को जन्म दिया है और मरूस्थलों का विस्तार किया है। 

4. ध्वनि प्रदूषण :– यातायात के साधनों औद्योगिकरण, भारी भीड़ मनोरंजन के साधनों आदि ने ध्वनि प्रदूषण को और अधिक बढ़ाया है। इसका भी मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। 

5. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन:- मनुष्य ने अपने उपयोग हेतु पुर्नउत्पादनीय एवं गैरे पुर्नउत्पादनीय संसाधनों का अधिक दोहन किया है। औद्योगिकरण के कारण अनेक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग हुआ है। जिससे कोयला, खनिज, तेल, गैस एवं अनेक खनिजों की उपलब्धता कहाँ से होगी। यह भी एक जटिल समस्या बन गई हैं। 

स्पष्ट है कि अनेक मानवीय क्रियाओं ने प्राकृतिक संतुलन को बहुत बाधित किया है। और ऐसी समस्याएँ पैदा कर दी है, जिसके कारण पर्यावरण दिन-प्रतिदिन ओर अधिक प्रदूषित होता जा रहा है।

पर्यावरण क्या है इसके महत्व को समझाइये?

पर्यावरण उस परिवेश को दर्शाता है जो कि सजीवों को चारो तरफ से घेरे रहता है व उनके जीवन को प्रभावित करता है | यह वायुमंडल, जलमंडल, स्थलमंडल और जीवमंडल से मिलकर बना होता है। इसके प्रमुख घटक मिट्टी, पानी, हवा, जीव और सौर ऊर्जा हैं। पर्यावरण ने एक आरामदायक जीवन जीने के लिए हमें सभी संसाधन प्रदान किए हैं।

पर्यावरण क्या है पर्यावरण के प्रकार बताइए?

इसी आधार पर प्राकृतिक पर्यावरण को जैविक तथा अजैविक भागों में बाँटा जाता है। जैविक तत्वों में सूक्ष्म जीव, पौधे और जन्तु शामिल है और अजैविक तत्त्वों के अन्तर्गत ऊर्जा, उत्सर्जन, तापमान, ऊष्मा प्रवाह, जल, वायुमण्डलीय गैसें, वायु, अग्नि, गुरुत्वाकर्षण, उच्चावच तथा मृदा उपस्थित है।

पर्यावरण क्या है उदाहरण सहित समझाइए?

पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ होता है हमारे आस-पास जो कुछ भी उपस्थित है जैसे की जल-थल, वायु और समस्त प्राकृतिक दशाएं, पर्वत, मैदान तथा अन्य जीवजन्तु, घर, मोहल्ला, गाँव, शहर, विद्यालय महाविद्यालय, पुस्तकालय आदि जो हमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं पर्यावरण कहलाता है।

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