इक्ता व्यवस्था क्या थी ? l Iqta Vyavastha Kya Thi

इक्ता व्यवस्था क्या थी ? l Iqta Vyavastha Kya Thi

इक्ता व्यवस्था क्या थी ? l Iqta Vyavastha Kya Thi

इक्ता व्यवस्था क्या थी ? l Iqta Vyavastha Kya Thi – तो दोस्तों इस आर्टिकल में हम आपको इक्ता व्यवस्था क्या थी ? l Iqta Vyavastha Kya Thi के बारे में बताने वाले है तो आर्टिकल ध्यान से पढ़ियेगा ताकि आपको इसके बारे में सारी जानकरी प्राप्त हो सके तो आइये जानते है, इक्ता व्यवस्था क्या थी ? l Iqta Vyavastha Kya Thi

सल्तनत काल में प्रांतों को प्रायः इक्ता कहा जाता था। इक्ता एक अरबी शब्द है जिसे एक तरह के प्रशासकीय अधिकार प्रदान करने के अर्थ में प्रयुक्त करा जाता था, परन्तु इस काल में हिंदी फारसी ग्रंथों में इक्ता व्यवस्था को भावी सेवा की शर्तों पर राजस्व हस्तांतरण के रूप में परिभाषित करा गया है।

इक्ता व्यवस्था की आवश्यकता / Iqta Vyavastha Ki Avashyakta

इक्ता व्यवस्था का प्रारंभ आरंभिक तुर्की सल्तानो की जरूरतों को पूरा करने के लिए हुई। राजधानी से दूर स्थित सल्तनत के क्षेत्र जिनसे राजस्व वसूली आसानी से ना हो, सुल्तान के जरिये इक्ता के रूप में दी जाने लगी। यह इक्ताएं सुल्तान की प्रशासनिक एवं सैनिक सेवा करने के बदले में दी जाती थी।

इस तरह सुल्तानों ने इक्ताए बाट कर सीमावर्ती क्षेत्रों में सल्तनत का प्रभाव स्थापित करा और नियमित रूप से राजस्व भी वसूला। दूसरी ओर, संबंधित अधिकारी को अपने अधीन क्षेत्र एक क्षेत्र दिया गया, जिसमें वह अपनी योग्यता के अनुसार राजस्व प्राप्त कर सकता था, गंगा यमुना दोआब में हिंदू जमींदारों की शक्ति को तोड़ने के लिए अमीरों को 2000 इक्ताएं बाटी।

इक्ता व्यवस्था का प्रारंभ

यद्यपि सबसे पहले 1191 ई. मोहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को हांसी का इक्तादार बनाया था। परन्तु दिल्ली सल्तनत में वास्तविक रूप से इल्तुतमिश ने इक्ता व्यवस्था को स्थापित कारी थी। इल्तुतमिश ने मुल्तान से लेकर लखनोती तक के क्षेत्र को इक्ता के रूप में विभाजित कर दिया।

इक्ता व्यवस्था के उद्देश्य

  • इक्ता व्यवस्था के उद्देश्य इस प्रकार है –
  • दूरस्थ क्षेत्रों से भी भू राजस्व हासिल करना।
  • स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर इक़्तेदारो के द्वारा करना।
  • दूरस्थ क्षेत्रों पर भी प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना।
  • बगैर केंद्र पर आर्थिक बोझ डाले इक़्तेदारो के द्वारा एक बड़ी सेना को तैयार करना।

इक्ता व्यवस्था के प्रकार

इक्ता की प्रायः दो श्रेणियां होती थी – प्रांतीय स्तर पर बड़ी इक्ता और ग्रामीण स्तर पर छोटी इक्ता होती थी।

प्रांतीय स्तर पर इक्ताए उच्च वर्ग के अमीरों को प्रदान की जाती थी। राजस्व संबंधी और प्रशासकीय दोनों तरह के उत्तरदायित्व इनके पद से जुड़े होते थे, जबकि छोटे का सुल्तान सैनिकों की वेतन के बदले दिया था ऐसी इक्ता पर किसी तरह के प्रशासनिक और आर्थिक उत्तरदायित्व नहीं दिए जाते थे।

बड़े इक्ता धारक अपनी बड़ी इक्ताए में से छोटी-छोटी इक्ताएं जिसे चाहे उसे प्रदान कर सकते थे, जैसे की बदायूं के मुक्ता ताजुद्दीन संजर कुलतुग मिनहाज-उस सिराज को 1242-46 में उस वक़्त इक्ता दी थी, जब उसे दिल्ली को छोड़ना पड़ा था।

इक़्तदारो के कार्य एवं कार्यकाल

बड़े इक्ता के अधिकारी मुक्ति या वली और छोटी इक्ता के अधिकारी इक्तादार कहलाते थे। मुक्ता या वली संबंधित क्षेत्र में भू राजस्व संग्रह करते थे, उस क्षेत्र का प्रशासन देखते थे और एक सैनिक टुकड़ी रखते थे उनसे अपेक्षा करी जाती थी कि अपना वेतन, सैन्य खर्च, प्रशासनिक खर्च काटने के बाद जो रकम शेष बचे उसे वह केंद्र के खजाने में भेज दे। ऐसी रकम फबाजिल कहलाती थी।

प्रायः मुक्ति या वली का पद वंशानुगत नहीं होता था साथ ही यह हस्तांतरणीय होता था। सियासतनामा के तहत मुक्ति का कार्यकाल 3 साल से ज्यादा का नहीं होना चाहिए।

विभिन्न सल्तनतों द्वारा इक्तादारी व्यवस्था में किए गए परिवर्तन

सल्तनत काल में इक़्तदारो पर अपना प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के लिए अनेक परिवर्तन लागू किए गए थे बलबन ने मुक्तियो को नियंत्रित करने के लिए इक्ता में ख्वाजा नामक अधिकारी को नियुक्त करा था अलाउद्दीन खिलजी ने मुक्तियो के स्थानांतरण पर बल दिया। वहीं गयासुद्दीन तुगलक ने इक्तादारो के व्यक्तिगत व्यय और उसके अधीन रखे गए सैनिकों के व्यय को पृथक कर दिया, जिससे की इक्तादार सैनिकों के वेतन में कमी ना कर सके।

इक्ता प्रणाली का विकास

इक्ता प्रथा में होने वाले सारे परिवर्तन दिल्ली सल्तनतों के अधीन अभी-अभी अभिजात वर्ग में परिवर्तन के साथ संबंधित थे। शुरुआत में इस पर तो तुर्को का एकाधिकार था पर धीरे-धीरे इसमें फारसी, अफगान, हब्शी और भारतीय मुसलमान भी आए जिससे इनका स्वरूप बदला।

खिलजी और प्रारंभिक तुगलको के अधीन इन नए लोगों के शामिल होने से इक्ता प्रथा पर सुल्तान की पकड़ मजबूत हुई, पर एक बार जब इनकी जड़ें मजबूत हो गई तब वह अधिक अधिकार की मांग करने लगे जिसके परिणाम स्वरूप फिरोज तुगलक के वक़्त विकेंद्रीकरण और मुक्तवाद का उदय हुआ।

इक्ता व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम

  • सुल्तान को बिना धन खर्चे की एक बड़ी सेना हासिल हो सकती थी।
  • दिल्ली सल्तनत का विस्तार हुआ और दूरस्थ क्षेत्रों पर सुल्तान का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ।
  • दूरस्थ के क्षेत्रों से भी फवाज़ील के रूप में सुल्तान को राजस्व की प्राप्ति होने लगी।
  • इक़्तदारो के द्वारा क्षेत्रीय स्तर पर कृषि वाणिज्य व्यापार कला साहित्य एवं संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया।

इक्ता व्यवस्था के नकारात्मक परिणाम

  • इक्तादार के पास सैनिक और राजस्व शक्ति होने से स्थानीय शोषण के प्रवर्तित को प्रोत्साहन मिला।
  • इक्तादारी व्यवस्था निर्मित विशाल सैनी संगठन में सहयोग और समन्वय का अभाव होता था।
  • सुल्तान और मुक्ता के संबंध, सुल्तान की स्थिति पर निर्भर करते थे। दुर्बल शासकों के वक़्त इक्तादार साम्राज्य के विघटन का कारण भी बने।

इक्तादारी प्रथा क्या होता है?

इक्तादारी प्रणाली वह प्रणाली थी जिसमें सुल्तानों ने अपने प्रशासनिक, सैनिक और भू राजस्व व्यवस्था का संगठन किया। दिल्ली सल्तनत की राजनैतिक व्यवस्था अपने पूर्वगामी राजपूत सामंती राज्य से भिन्न थी। यह भिन्नता 2 प्रकार से दिखाई देती है। एक तो इक्ता अर्थात हस्तांतरण लगान अधिन्यास एवं दूसरे शासक वर्ग का स्वरूप।

यह भी पड़े :

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *