Dhara 66a IT Act in Hindi Kya Hai PDF धारा 66a

Dhara 66a IT Act in Hindi Kya Hai PDF धारा 66a

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Dhara 66a IT Act

धारा 66 A चर्चा में है। परन्तु इसे सुप्रीम कोर्ट 06 वर्ष पहले ही निरस्त कर चुका था पर इसके बाद भी सूचना प्रौद्योगिकी का ये कानून अब तक देश के 11 राज्यों में प्रभाव में था। पुलिस लगातार इसके माध्यम से मामले दर्ज कर रही थी। कुछ वक़्त पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर तीखी टिप्पणी की थी। इसके बाद मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़े तरीके से सरकारों को लताड़ा। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद ये धारा चर्चा में है।

आखिर क्या है धारा 66 A एवं क्यों सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त किया था। तब ऐसा कौन सा मामला सामने आया था, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला किया था। साल 2015 में जब ये धारा निरस्त हुई थी तब इस धारा के द्वारा 11 राज्यों में 229 मामले लंबित थे। अब पिछले कुछ वर्षो में इन्हीं राज्यों में 1307 मामले दर्ज किए गए हैं।

क्या थी धारा 66 ए

हालाँकि हाल के कुछ सालो में सोशल मीडिया पर कथित तौर पर आपत्तिजनक पोस्ट करने पर जिस धारा में प्रशासन एवं पुलिस लोगों पर मुकदमा दर्ज कर रही थी, वो धारा 66 A ही था। इसमें सोशल मीडिया तथा आनलाइन पर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी करना कानून के दायरे में आता था, पर इसकी परिभाषा गोलमोल थी, जिससे इसका दायरा इतना बढ़ा हुआ था कि यदि पुलिस-प्रशासन चाहे तो हर आनलाइन पोस्ट पर गिरफ्तारी हो सकती थी या एफआईआर हो सकती थी। ये धारा सूचना-प्रौद्योगिकी अधिनियम के अंतर्गत आती थी।

क्यों सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त किया था

साल 2015 में जब सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त किया तो उसका मानना था कि ये धारा संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) यानि बोलने एवं अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है। कोर्ट ने तब धारा को शून्य करार दिया था। इससे पहले धारा 66 A के अन्तर्गत आनलाइन तौर पर आपत्तिजनक पोस्ट डालने पर 03 वर्ष की सजा का प्रावधान था।

ये धारा तब पुलिस को क्या अधिकार देती थी

धारा 66 A तब पुलिस को अधिकार देती थी कि वो कथित तौर पर आपत्तिजनक कंटेंट सोशल साइट या नेट पर डालने वालों को गिरफ्तार कर सकती थी। पर अब पुलिस ऐसा नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे क्यों निरस्त किया था

तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस कानून की परिभाषा स्पष्ट नहीं है एक कंटेंट जो किसी एक के लिए आपत्तिजनक होगा तो दूसरे के लिए नहीं। अदालत ने कहा था कि धारा 66 A से लोगों के जानने का अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित होता है।
तब तत्कालीन जस्टिस जे. चेलमेश्वर एवं जस्टिस रॉहिंटन नारिमन की बेंच ने कहा था कि ये प्रावधान साफ तौर पर संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रभावित करता है।
तब शीर्ष अदालत ने ये भी कहा था कि 66 A का जो मौजूदा दायरा है, वो काफी व्यापक है। ऐसे में कोई भी शख्स नेट पर कुछ पोस्ट करने से डरेगा। ये विचार अभिव्यक्ति के अधिकार को अपसेट करता है। ऐसे में 66ए को हम गैर संवैधानिक करार देते हैं।

किसने इस धारा को कोर्ट में चुनौती दी थी

शिवसेना चीफ रहे बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई की लाइफ अस्त-व्यस्त होने पर फेसबुक पर टिप्पणी की गई थी। घटना के बाद टिप्पणी करने वालों की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद इस मामले में लॉ स्टूडेंट श्रेया सिंघल की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई। याचिका मे IT Act की धारा-66 A कोसमाप्त करने की गुहार लगाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में ऐतिहासक फैसले में इसे निरस्त कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या टिप्पणी की थी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कुछ वक़्त पहले इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस को कठघरे में खड़ा किया था। उसने ऐसी रिपोर्ट को रद्द कर दिया था। इसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस अफसरों पर भी कड़ी टिप्पणी की थी कि वो इस धारा के निरस्त होने के बाद भी इसके अंतर्गत प्राथमिकी कैस दर्ज कर रहे हैं।

कब ये धारा अस्तित्व में आई

IT Act में Dhara 66 A को साल 2009 में संशोधित अधिनियम के अंतर्गत जोड़ा गया था। उक्त प्रावधान ये कहता था कि कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण के तहत संदेश भेजने वाले उन व्यक्तियों को दंडित करा जा सकता है,जो-

  1. कोई भी ऐसी जानकारी भेजते हैं जो मोटे तौर पर आपत्तिजनक है या धमकाने वाली है।
  2. ऐसी कोई भी जानकारी जिसे वह झूठी मानता है, पर इस प्रकार के कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण का प्रयोग करके झुंझलाहट, असुविधा, खतरा, बाधा, अपमान, चोट, आपराधिक धमकी, दुश्मनी, घृणा या बीमार इच्छाशक्ति पैदा करने के उद्देश्य से भेजता है।
  3. किसी भी इलेक्ट्रॉनिक मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल संदेश को झुंझलाहट, असुविधा, धोखा देने एवं प्राप्तकर्ता को इस प्रकार के संदेशों की उत्पत्ति के बारे में भ्रमित करने के उद्देश्य से इस्तेमाल करना।

इस अपराध के लिए 3 वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती थी। साथ में जुर्माना भी लगाया जा सकता था।

संसद में उठ चुका है मामला

लोकसभा में 2013 में प्राइवेट बिल किया गया। इसमें 66 A के औचित्य एवं क्रियान्वयन पर प्रश्न उठाया गया। ये कहा गया कि जब भारतीय दंड संहिता, 1860 में इसे पहले ही कवर किया जा रहा है तो इसके लिए दोहरा कानून लाने का क्या अर्थ है। दोनों कानूनों में कहीं ना कहीं अस्पष्टता भी थी। इस पर इसके बाद फिर प्राइवेट लाया गया, जिसमें इसमें सुधार की मांग की गई।

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