आर्थिक समस्या क्या है ? l Bharat ki Aarthik Samasya Kya Hai in Hindi

आर्थिक समस्या क्या है ? l Bharat ki Aarthik Samasya Kya Hai in Hindi

आर्थिक समस्या क्या है ? l Bharat ki Aarthik Samasya Kya Hai in Hindi

आर्थिक समस्या क्या है ? l Bharat ki Aarthik Samasya Kya Hai in Hindi – तो दोस्तों इस आर्टिकल में हम आपको आर्थिक समस्या क्या है ? l Bharat ki Aarthik Samasya Kya Hai in Hindi के बारे में हम आपको सारी जानकारी प्रदान करने वाले है तो आर्टिकल ध्यान से पढ़ियेगा ताकि आपको इसके बारे में सारी जानकारी प्राप्त हो सके तो आइये जानते है, आर्थिक समस्या क्या है ? l Bharat ki Aarthik Samasya Kya Hai in Hindi

Bharat ki Aarthik Samasya Kya Hai ? / भारत की आर्थिक समस्या क्या है ?

प्रत्येक अर्थव्यवस्था की कुछ आधारभूत आर्थिक समस्याएं हैं। इन आधारभूत समस्याओं की विस्तृत विवेचना करने से पहले यह जानना जरुरी है कि आर्थिक समस्या से अभिप्राय क्या है। प्रत्येक मनुष्य की जरूरते असीमित हैं पर उन्हें संतुष्ट करने वाले अधिकतर साधन सीमित हैं। एक अर्थव्यवस्था के लिये यह सम्भव नहीं है कि वह हर एक नागरिक के लिये प्रत्येक वस्तु का उत्पादन कर सके क्योंकि किसी भी अर्थव्यवस्था के पास इतने ज्यादा साधन नहीं होते। प्रत्येक अर्थव्यवस्था को यह चुनाव करना पड़ता है कि अर्थव्यवस्था के वैकल्पिक प्रयोग वाले साधनों (Resources) जैसे की भूमि, श्रम और पूंजी का किस प्रकार कुशलतापूर्वक प्रयोग किया जाए।

उदाहरण के लिए, अर्थव्यवस्था को यह निर्णय लेना पड़ता है कि कितने साधनों का प्रयोग मक्खन के और कितने साधनों का उपयोग बन्दूकों के उत्पादन के लिए किया जाये। साधनों के विभिन्न उपयोगों में बंटवारे (Allocation) सम्बन्धी इस समस्या को ही आर्थिक समस्या कहा जाता है। अत: आर्थिक समस्या चुनाव की समस्या या साधनों के बचतपूर्ण प्रयोग की समस्या (Economising Problem) है। यह ध्यान रखना चाहिए कि आर्थिक समस्या सिर्फ वर्तमान साधनों के वितरण की समस्या ही नहीं वरना भविष्य में उनके विकास की समस्या (Problem of Growth & Distribution of Resources) भी है। आर्थिक समस्या वह समस्या है जिसका सम्बन्ध वर्तमान साधनों के उचित बंटवारे एवं भविष्य के साधनों की वृद्धि तथा उनके वितरण से है।

आर्थिक समस्या की परिभाषा

राबर्ट यॉह के अनुसार, “आर्थिक समस्या वह समस्या है जिसका सम्बन्ध चुनाव की इस आवश्यकता से है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन करना है तथा आर्थिक प्रगति कैसे प्राप्त करनी है।” 

लेफ्टविच के अनुसार, “आर्थिक समस्या का सम्बन्ध मनुष्य की वैकल्पिक आवश्यकताओं के लिए सीमित साधनों के वितरण तथा इन साधनों का अधिक से अधिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिये प्रयोग करने से है।”

आर्थिक समस्या के कारण

आर्थिक समस्या के उत्पन्न होने के दो मुख्य कारण हैं

1. असीमित आवश्यकताएं 

मनुष्य की जरूरते जो पदार्थों व सेवाओं के इस्तेमाल के जरिये सन्तुष्ट की जा सकती हैं, असीमित होती हैं। कोई भी मनुष्य अपनी सभी जरूरतों को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं कर सकता। किसी समाज के सभी सदस्यों की जरुरत को किसी निश्चित वक़्त में पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता। वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य की जरूरते दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। कुछ साल पहले रंगीन टेलीविजन की कोई मांग नहीं थी पर अब लगभग प्रत्येक परिवार रंगीन टेलीविजन खरीदना चाहता है। 

वक़्त के साथ-साथ वीडियो कैमरों, कीमती कारों, वी.सी.आर., डीलक्स कार, कम्प्यूटर, कैलकूलेटर इलेक्ट्रॉनिक टाईपराइटर इत्यादि की मांग में काफी वृद्धि होने की सम्भावना है। हम यह कह सकते हैं कि किसी निश्चित वक़्त में प्रत्येक समाज में असन्तुष्ट जरूरते होती हैं।

2. सीमित या दुर्लभ संसाधन 

जरूरतों को सन्तुष्ट करने के लिए बहुत-सी वस्तुओं और सेवाओं की आवश्यकता होती है। भूख लगने पर रोटी, फल या दूध की जरुरत होती है। बीमार होने पर डाक्टर की सेवा की जरुरत पड़ती है। प्यास लगने पर पानी की जरुरत होती है। सांस लेने के लिए वायु की आवश्यकता होती है। 

आप यह भी जानते हैं कि पानी और वायु को प्राप्त करने के लिए आपको कोई त्याग नहीं करना पड़ता अथवा कोई कीमत नहीं देनी पड़ती। इसके विपरीत रोटी, फल, दूध एवं डाक्टर की सेवाओं को पाने के लिए आपको अपनी किसी वस्तु या सेवा का त्याग करना पड़ेगा अथवा मुद्रा के रूप में कीमत देनी पड़ती है। 

उन वस्तुओं और सेवाओं को जिन्हें प्राप्त करने के लिए हमें कीमत देनी पड़ती है अथवा किसी दूसरी वस्तु या सेवा का त्याग करना पड़ता है, आर्थिक पदार्थ कहा जाता है। आर्थिक पदार्थ को सीमित साधन या धन भी कहा जाता है, जैसे की रोटी, फल आदि वस्तुएं, डाक्टर, वकील आदि की सेवाएं। इन पदार्थों को सीमित इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनकी मांग, इनकी पूर्ति से ज्यादा होती है। जरूरतों को पूरा करने वाले अधिकतर साधन सीमित होते हैं। यहां सीमित शब्द का उपयोग सापेक्ष (Relative) रूप से किया गया है। हम उन साधन को सीमित कहते हैं जिसकी मांग उसकी पूर्ति की तुलना में ज्यादा होती है। 

मान लो हम 30 KG सेब की एक पेटी खरीदते हैं, जिसमें 25 किलोग्राम सेब अच्छी श्रेणी के हैं पर 5 किलोग्राम सेब गले हुए हैं। हम उन गले हुए सेबों को फेंक देते हैं। ये फेंके गए 5 kg सेब दुर्लभ नहीं हैं; बल्कि इसके विपरीत 25 kg बढ़िया सेब, इन 5 किलोग्राम गले हुए सेबों की तुलना में, ज्यादा होते हुए भी दुर्लभ हैं क्योंकि इनकी मांग पूर्ति से ज्यादा है। आर्थिक पदार्थ दुर्लभ होते हैं क्योंकि इनका उत्पादन करने वाले साधन (Resources) भी दुर्लभ होते हैं। साधनों से हमारा अभिप्राय प्राकृतिक, मानवीय और मनुष्य के जरिये निर्मित उन साधनों से है जिनके जरिये वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाता है। इनके तहत कारखाना, खेत, मशीनें, औज़ार, विभिन्न प्रकार का श्रम तथा उनकी योग्यताएं सभी प्रकार के खनिज पदार्थ आदि सम्मिलित किए जाते हैं। 

अध्ययन की सरलता की दृष्टि से इन साधनों का 4 विभिन्न वर्गों में वर्गीकरण करा जाता है।

भूमि (Land) : भूमि से अभिप्राय उन सब प्राकृतिक साधनों से है जो प्रकृति के नि:शुल्क उपहार हैं और जिन्हें उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग किया जाता है। इन साधनों में भूमि, खजिन, पैट्रोलियम, जल, सूर्य की रोशनी, नदियां, वन आदि सम्मिलित किये जाते हैं।

श्रम (Labour) : अर्थशास्त्रा में श्रम से अभिप्राय उन सब भौतिक और मानसिक योग्यताओं से है जिनका वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में प्रयोग किया जाता है। इसके तहत सभी प्रकार की सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है, चाहे वह घरेलू नौकर की सेवाएं हैं अथवा एक इंजीनियर की सेवाएं हैं।

पूंजी (Capital) : पूंजी से अभिप्राय मनुष्य के जरिये निर्मित उत्पादन (वितरण, भण्डार, यातायात आदि) साधनों से है जिनके फलस्वरूप ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है। इसके तहत मशीनें, यन्त्रा, यातायात के साधन, दफ्तर के भवन, कारखाने आदि सम्मिलित किये जाते हैं।

उद्यम (Enterprise) : उद्यम से अभिप्राय जोखिम उठाने, व्यवसाय का संचालन करने इत्यादि योग्यताओं से है जिनके फलस्वरूप उत्पादन का संगठन करना सम्भव होता है। एक उद्यमी अपने समय, श्रम एवं पूंजी का जोखिम उठाता है और उत्पादन सम्बन्धी निर्णय के लिए उत्तरदायी होता है।

उत्पादन के सभी साधन अर्थात् श्रम, पूंजी और उद्यम सीमित होते हैं, इसका अर्थ यह है कि इनकी पूर्ति इनकी मांग की तुलना में कम होती है एवं इनको प्राप्त करने के लिए कुछ कीमत देनी पड़ती है। यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत ज्यादा श्रम शक्ति है पर वह अनन्त नहीं है एवं न ही नि:शुल्क उपलब्ध है। इसी तरह खेती योग्य समस्त भूमि हमारी कृषि सम्बन्धी जरूरतों को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं है। वास्तव में साधनों के सीमित होने का अर्थ यह है कि असीमित जरूरतों को सन्तुष्ट करने के लिए वे पर्याप्त नहीं है। यद्यपि वक़्त के साथ-साथ साधनों की उपलब्धि बढ़ती जाती है पर वे हमारी सभी जरूरतों को सन्तुष्ट करने में अपर्याप्त रहते हैं क्योंकि जरूरते भी बढ़ती जाती हैं। यद्यपि उत्पादन के साधन भी असीमित होते तो कोई आर्थिक समस्या उत्पन्न नहीं होती। वास्तव में तब अर्थशास्त्रा जैसा विषय भी नहीं होता। दुर्लभता आर्थिक समस्याओं का मूल कारण है। उत्पादन के साधनों की एक ओर भी विशेषता है कि इनके वैकल्पिक प्रयोग (Alternative Uses) ) होते हैं। लकड़ी का उपयोग फर्नीचर बनाने में, खेल का सामान, मकान के दरवाजे, रेल के डिब्बे एवं अन्य कार्यों के लिए किया जा सकता है। साधनों के वैकल्पिक प्रयोग होने के फलस्वरूप चुनाव की समस्या (Problem of Choice) उत्पन्न होती है। यह चुनाव की समस्या ही आर्थिक समस्या है। अगर हम किसी साधन का एक विकल्प में उपयोग करते हैं तो हमें दूसरे विकल्प का त्याग करना पड़ेगा। हम एक विकल्प (Alternative) को प्राप्त करने के लिए जिस विकल्प का त्याग करते हैं वह प्राप्त किए गए विकल्प की अवसर लागत (Opportunity Cost) कहलायेगा। 

अवसर लागत एक निश्चित उद्देश्य के लिए साधनों के उपयोग की वह लागत है जो उन साधनों का सर्वोत्तम वैकल्पिक प्रयोग नहीं कर सकने के कारण त्यागे जाने वाले लाभ (Benefits) के जरिये मापी जाती है। अवसर लागत की धारणा, एक वस्तु की प्राप्त मात्रा की लागत को अन्य वस्तुओं की मात्रा के रूप में जो उसके बदले में हासिल की जा सकती थी, को माप कर चुनाव की समस्या पर बल देती है, संक्षेप में, साधनों का सीमित होना और इनका वैकल्पिक प्रयोग होना आर्थिक समस्याओं के उत्पन्न होने का मुख्य कारण है। चूंकि एक अर्थव्यवस्था अपनी जरुरत की सभी वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन नहीं कर सकती, अन्य शब्दों में, वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक वस्तु का उत्पादन नहीं कर सकती, इसलिए उसके सम्मुख कुछ आधारभूत समस्याएं होती हैं जिनके सम्बन्ध में उसे चुनाव करना पड़ता है। इन समस्याओं को ही अर्थव्यवस्था की आधारभूत समस्याएं कहा जाता है।

भारत की आर्थिक समस्या क्या है?

राजकोषीय एवं व्यापार घाटे में बढ़ोतरी

हालांकि 2012 के बजट में ये अनुमान लगाया गया है कि 2012-13 में ये घाटा कम होकर 5.1 प्रतिशत तक हो जाएगा, पर कई अर्थशास्त्री इससे इत्तेफाक नहीं रखते। धीमी विकास दर, सरकारी राजस्व में अनुमान से कम बढ़ोतरी एवं खर्च में अनुमान से अधिक बढ़ोतरी चिंता का विषय है।

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